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संविधान की अनुच्छेद 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगाराष्‍ट्रपति इस मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्‍पादन करेगा। इस प्रकार वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित होती है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।
प्रधानमंत्री की नियुक्ति
संविधान में प्रधानमंत्री का कार्यकाल तय नहीं है। प्रधानमंत्री के संवैधानिक प्रावधानों का वर्णन इस प्रकार हैं:
·         केंद्र सरकार के पास एक मंत्री परिषद होगी जिसके मुखिया प्रधानमंत्री होंगे।
·         प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी
·         अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
·         राष्ट्रपति के मर्जी से मंत्री अपने पद पर बने रहेंगे।
·         कोई एक मंत्री जो माह तक किसी लगातार संसद का सदस्य नहीं है तो वह मंत्री पद पर बने रहने के लिए अयोग्य होगा।
शक्तियां और कार्य
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री के कई महत्वपूर्ण कार्य होते हैं और प्रधानमंत्री अपने लाभ के लिए व्यापक शक्तियों का उपयोग करते हैं। वह देश का मुख्य कार्यकारी या सर्वेसर्वा होता है और केंद्र सरकार के मुखिया के रूप में कार्य करता है।
1) सरकार का मुखिया - राष्ट्रपति देश के मुखिया होते हैजबकि प्रधानमंत्री सरकार के मुखिया होते हैं। सभी निर्णय मंत्री परिषद और प्रधानमंत्री की सलाह व सहायता के बाद राष्ट्रपति के नाम पर लिये जाते हैं। यहां तक ​​कि वह (राष्ट्रपति) प्रधानमंत्री की सिफारिश के अनुसार ही अन्य मंत्रियों की नियुक्त करते हैं।
2) कैबिनेट अथवा मंत्रिमंडल का नेता - अपनी नियुक्तियों के बारे में वही राष्ट्रपति को सिफारिश करता है कि कौन क्या हैवह मंत्रियों के बीच विभिन्न विभागों का आवंटन और फेरबदल करता है। वह मंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णय को प्रभावित करता है। प्रधानमंत्री मंत्री मंडल किसी भी सदस्य को इस्तीफा देने के लिए कह सकता है या राष्ट्रपति को किसी भी मंत्री को हटाने की सिफारिश कर सकता है। यदि प्रधानमंत्री की मृत्यु या इस्तीफा हो जाता है तो पूरा मंत्री मंडल भंग हो जाता है।
3) राष्ट्रपति और मंत्री मंडल के बीच संबंध अथवा कड़ी - संविधान के अनुच्छेद 78 में प्रधानमंत्री के कर्तव्य निर्दिष्ट हैं और उनके निर्वहन के लिए वह राष्ट्रपति और कैबिनेट के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। निम्नलिखित ऐसे मामले हैं जहां वह ऐसे कार्य करता है:
·         केंद्रीय मामलों के प्रशासन और कानून के लिए प्रस्तावों से संबंधित मंत्री परिषद के सभी निर्णयों पर संवाद करतेसमय,
·         जब मंत्री परिषद द्वारा किसी भी निर्णय पर विचार करने के लिए संविधान की किसी भी धारा या परिषद की राय नहीं ली जाती है तो तब राष्ट्रपति इस तरह के मुद्दों पर विचार करने के लिए प्रधानमंत्री से प्रश्न कर सकते हैं।
·         जब राष्ट्रपति संघ के मामलों या किसी ऐसी बातों के प्रशासन के बारे में कोई भी जानकारी मांगते हैं।
4) संसद का नेता - एक नेता के रूप में वह वह सत्र के लिए अपनी बैठकों और कार्यक्रमों की तिथियों का निर्धारण करता है। वह यह फैसला भी करता है कि कब सदन का सत्रावसान किया जाय या उसे भंग किया जाए। एक मुख्य प्रवक्ता के रूप में वह सरकार की प्रमुख नीतियों की घोषणा करता है और तत्पश्चात् सवालों के जवाब देता है।
5) विदेशी संबंधों में मुख्य प्रवक्ता - अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में वह राष्ट्र का प्रवक्ता होता है।
6) पार्टी का नेता - वह अपनी पार्टी के सदस्यों का नेता होता है  
7) विभिन्न आयोगों का अध्यक्ष- प्रधानमंत्री होने के नाते वह वह कुछ आयोगों का वास्तविक अध्यक्ष होता है जैसे- योजना आयोगराष्ट्रीय विकास परिषदराष्ट्रीय एकता परिषदअंतर-राज्यीय परिषदराष्ट्रीय जल संसाधन परिषद।
गठबंधन सरकार में कार्य
राज्य की गतिविधियों के एक विशेष उद्देश्य को हल करने के लिए एक अस्थायी अवधि के लिए दो या दो से अधिक अलग-अलग दलों के व्यक्तियों के एक साथ आने या एक गठबंधन में प्रवेश करने को गठबंधन कहते हैं।
एकल पार्टी सरकार में शक्तियां
जब चुनावों में एक दल पूरा बहुमत हासिल कर लेता है तो तब राष्ट्रपति उस दल के नेता को प्रधानमंत्री के रूप में सरकार बनाने और कार्य करने के लिए आमंत्रित करते हैं। संविधान में यह उल्लेख है कि इस तरह के मामलों में प्रधानमंत्री के पास बिना प्रतिबंधों के साथ सभी अधिकार होगें। इस प्रकारइस तरह की सरकार अधिक स्थिर होती है।
अल्पसंख्यक सरकार में भूमिका
संसदीय प्रणाली में अल्पमत सरकार का गठन तब होता है जब एक राजनीतिक पार्टी या पार्टियों के गठबंधन के पास संसद में कुल सीटों का बहुमत नहीं होता हैलेकिन एक त्रिशंकु लोकसभा चुनाव परिणामों को तोड़ने के लिए अन्य दलों के बाहरी समर्थन द्वारा एक सरकार शपथ लेती है। ऐसी परिस्थिति में अन्य दलों के समर्थन के से ही कानून पारित किया जा सकता है। यह सरकार बहुमत वाली सरकार की अपेक्षा में कम स्थिर होती है। राजनीतिक इतिहास में इसका एक बेहतरीन उदाहरण नरसिंहा राव की सरकार रही है। ऐसी स्थिति में यह जरूरी नहीं है कि सबसे बडी पार्टी का नेता ही प्रधानमंत्री होगा बल्कि वह सभी सदस्यों द्वारा तय किया गया कोई भी व्यक्ति हो सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार कानून पारित कराने के लिए अन्य दलों पर निर्भर रहती है। गठबंधन और अल्पमत सरकार के बीच प्रमुख अंतर यह है कि गठबंधन सरकार में अल्पमत सरकार में विपक्षी दल एक समझौते का निर्माण कर सकते हैं जिसके द्वारा उन्हें सरकार पर नियंत्रण करने की अनुमति प्राप्त हो जाती है।
भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची (अभी तक)
क्र.सं.
नाम
कार्यकाल अवधि
1.
जवाहरलाल नेहरू
1947- 1964
2.
गुलजारी लाल नंदा
1964- 1964
3.
लाल बहादुर शास्त्री
1964- 1966
4.
गुलजारी लाल नंदा
1966- 1966
5.
इंदिरा गांधी
1966- 1977
6.
मोरारजी देसाई
1977- 1979
7.
चरण सिंह
1979- 1980
8.
इंदिरा गांधी
1980- 1984
9.
राजीव गांधी
1984- 1989
10.   
विश्वनाथ प्रताप सिंह
1989- 1990
11.   
चंद्रशेखर
1990- 1991
12.   
पी वी नरसिंह राव
1991- 1996
13.   
अटल बिहारी वाजपेयी
1996- 1996 (16 दिन)
14.   
एच डी देवगौड़ा
1996- 1997
15.   
आई के. गुजराल
1997- 1998
16.   
अटल बिहारी वाजपेयी
1998- 1999
17.   
अटल बिहारी वाजपेयी
1999- 2004
18.   
डॉ मनमोहन सिंह 
2004- 2009
19.   
डॉ मनमोहन सिंह
2009- 2014
20.   
नरेंद्र मोदी  
2014  से अभी तक
भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय
प्रधानमंत्री कार्यालय की महत्वता और इसकी जिम्मेदारियों की वजह से चर्चित है। इसलिए बड़ी जिम्मेदारी के निष्पादन के लिए उसे प्रधानमंत्री के कार्यालय द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। इसे सचिवीय सहायता प्रदान करने के अनुच्छेद 77 (3) के प्रावधान के तहत एक निर्मित प्रशासनिक एजेंसी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसकी शुरूआत 1947 में प्रधानमंत्री पद के सचिव के रूप में हुयी थी तत्पश्चात् 1977 में पुर्न: नामित कर इसका नाम प्रधानमंत्री कार्यालय रखा गया। व्य़ापार आवंटन नियम 1961 के तहत इसे विभाग का दर्जा प्राप्त है। यह स्टाफ एजेंसी मुख्यत: भारत सरकार के शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने में सहायता प्रदान करती है। लेकिन फिर भी इसके महत्व अतिरिक्त संवैधानिक निकाय के रूप में भी है।
संरचना -
·         राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री इसका अध्यक्ष होता है
·         प्रशासकीय रूप से प्रधान सचिव इसका अध्यक्षता होता है
·         एक या दो अतिरिक्त सचिव होते हैं
·         संयुक्त सचिव होते हैं
·         कई निदेशकउप सचिव और सचिवों के नीचे वाले अधिकारी होते हैं।
(कार्मिक जो आम तौर पर सिविल सेवाओं में होते हैं उन्हें अनिश्चत काल के नियुक्त किया जाता है)
भूमिकाएं और कार्य
व्यापार नियम आवंटन 1961 के अनुसारपीएमओ के बुनियादी कार्य हैं-
1.    प्रधानमंत्री को सचिवीय सहायता प्रदान करना और एक थिंक टैंक के रूप में कार्य करना।
2.    वे सभी मामलों जिन पर प्रधानमंत्री रुचि रखते हैंके लिए केंद्रीय मंत्रियों और राज्य सरकारों के साथ उसके संबंधों सहित मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में प्रधानमंत्री को समग्र जिम्मेदारियों के निष्पादन में मदद करना।
3.    योजना आयोग के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री को उसकी जिम्मेदारी के निर्वहन में मदद करना।
4.    प्रधानमंत्री के जन सम्पर्क से संबंधित पक्ष जो बौद्धिक मंचों और नागरिक समाज से संबंधित होते हैंउनमें मदद करना। इससे यह दोषपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ जनता से प्राप्त शिकायतों पर विचार करने के लिए यह जनसंपर्क कार्यालय के रूप में कार्य करता है।
5.    वर्णित नियमों के तहत आदेश हेतु प्रस्तुत मामलों के परीक्षण में प्रधानमंत्री को सहायता प्रदान करना जिससे प्रशासनिक संदेह से संबंधित मामलों पर सदन निर्णय ले सकता है।
विभिन्न प्रधान मंत्रियों की विकासवादी प्रवृत्ति
भारत में प्रशासन के केंद्रीकरण की धुरी पीएमओ के हाथों में में होती है जो प्रधानमंत्री के स्वभाव से प्रभावित रहती है और वह अपने सचिव की स्थिति को प्रभावित करता है या करती है। 
राज्यपाल
अनुच्छेद 153 के तहत प्रत्येक राज्य का राज्यपाल होना चाहिए / राज्य के कार्यकारी के तहत राज्यपालमंत्रियों की परिषद और राज्य के महाधिवक्ता होते हैं। राज्यपाल भी राज्य का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है जो अपने कार्य संबंधित राज्य के मंत्रियों की परिषद की सलाह के अनुसार करता हैइस के अलावाराज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दोहरी भूमिका निभाता हैइसकी नियुक्ति राष्ट्रपति के आदेश पर पांच वर्षों के लिए की जाती है परन्तु वह राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त ही पाने पद पर रह सकता है|
राज्यपाल की नियुक्ति
राज्यपाल के रूप में नियुक्ति के लिए योग्यता (अनुच्छेद 157) –
संविधान ने निम्न योग्यताएँ राज्यपाल को नियुक्त किए जाने के लिए रखी हैं :  
• वह भारत का नागरिक हो
• उसने 35 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो|
• वह राज्य के बाहर का व्यक्ति होना चाहिए ताकि वह स्थानीय राजनीति में लिप्त ना हो|
• एक ही व्यक्ति को या से ज्यादा राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता हैतो उसे दोनों राज्यों की तनख्वाह दी जाती है
• राज्यपाल की परिलब्धियां और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जा सकते।
राज्यपाल के अधिकार
राज्य के राज्यपाल के पास कार्यकारीविधायीवित्तीय और न्यायिक अधिकार होंगे|  लेकिन उसके पास भारत के राष्ट्रपति की तरह कूटनीतिकसैन्य या आपातकालीन अधिकार नहीं होंगेराज्यपाल की अधिकार और कार्य निम्नलिखित शीर्षों के अंतर्गत वर्गीकृत किये  जा सकते  है:
1. कार्यकारी अधिकार
2. विधायी अधिकार
3. वित्तीय अधिकार
4. न्यायिक अधिकार
कार्यकारी अधिकार
जैसा की ऊपर बताया गया है कि कार्यकारी अधिकार उन अधिकारों को कहा जाता है जिनका प्रयोग राज्यपाल के नाम पर मंत्रियों की परिषद द्वारा किया जाता हैइसलिए राज्यपाल केवल नाममात्र का प्रमुख और मंत्रियों की परिषद वास्तविक कार्यकारी होती हैं। निम्नलिखित पद राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए जाते है और अपने कार्यकाल के दौरान अपने पद पर बने रहते हैं: राज्य का मुख्य मंत्रीमुख्यमंत्री की सलाह पर राज्य के अन्य मंत्री महाधिवक्ता। वह राष्ट्रपति से एक राज्य में संवैधानिक आपातकाल लगाने की सिफारिश भी कर सकता है । एक राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि के दौरानराज्यपाल को राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में व्यापक कार्यकारी अधिकार प्राप्त होते है।
विधायी अधिकार :
राज्यपाल के यह अधिकार उपसमूहों में वर्गीकृत किए जा सकते हैं : बिल के संदर्भ में और विधान सभा के संदर्भ में|
बिल के संदर्भ में
• धन विधेयक के अलावा अन्य विधेयक को उसकी मंजूरी के लिए राज्यपाल के सामने पेश किया जाता है तो वहबिल पर सहमति दे सकता हैबिल को अपने पास रख सकता हैबिल को सदनों में पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है परंतु यदि विधान सभा के द्वारा संशोधित या बिना संशोधन के फिर से बिल पारित कर दिया जायेतो उसे अपनी सहमति देनी पड़ती है या राष्ट्रपति के विचार के लिए बिल को आरक्षित कर लेता है|  हालांकिराज्यपाल पुनर्विचार के लिए धन विधेयक बिल वापस नहीं भेज सकता|यह इसलिए है क्योंकि आमतौर पर   यह विधेयक केवल राज्यपाल की पूर्व सहमति के साथ ही पेश किया जाता हैं|यदि विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति के लिए आरक्षित किया जाता है तो राष्ट्रपति ये जान सकता है की राज्यपाल अपनी सहमति दे रहा है या अपनी सहमति पर रोक लगा रखी है|
विधान सभा के संदर्भ में
राज्यपाल के पास राज्य विधानसभा को बुलाने व स्थगित करने का अधिकार है और यह विधान सभा को भंग भी  कर सकता है जब वह अपना बहुमत खो देती है (अनुच्छेद176 )|
वित्तीय अधिकार
• वह वार्षिक वित्तीय विवरण (राज्य का बजट) विधानसभा के समक्ष रखता है|
• धन विधेयक केवल राज्य विधानसभा में इसकी पूर्व अनुशंसा से  ही पेश किया जा सकता है
• अनुदान के लिए कोई भी मांग नहीं की जा सकती (जब तक उसकी अनुशंसा न हो)|
• अप्रत्याशित व्यय को पूरा करने के लिए आकस्मिकता निधि से पैसा राज्यपाल की अनुशंसा के बाद ही निकाला जा सकता है|
• वह नगरपालिका और पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के लिए हर साल में वित्त आयोग का गठन करता है।
न्यायिक अधिकार-
राष्ट्रपति संबन्धित राज्य के राज्यपाल से सलाह करता है जब भी उसे राज्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को नियुक्त करना हो|
माफी के अधिकार -
• माफ़ी – अपराधी को पूरी तरह दोषमुक्त करना
• फांसी स्थगित करना - सजा के क्रियान्वयन पर रहना
• राहत देना - कुछ विशेष परिस्थितियों में कम सजा की राहत प्रदान करना
• छूट देना -  सजा के चरित्र को बदले बिना सज़ा में छूट देना
• प्रारूप बदल देना – सज़ा के एक रूप को दूसरे से बदल देना|
विवेकाधीन अधिकार -
अध्यादेश लेने का अधिकार
राज्यपाल का निष्कासन
केंद्र सरकार को राष्ट्रपति की सहमती के आधार पर किसी भी राज्य के राज्यपाल को किसी भी समय हटाने का अधिकार हैयहाँ तक की उसे हटाये जाने के कारण बताए बिना|
• हालांकि इन अधिकारों का मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं किया जा सकता। इनका प्रयोग असामान्य और असाधारण परिस्थितियों में  वैध और मजबूरी के कारण किया जा सकता है|
• एक मात्र कारण कि राज्यपाल के विचार व नीतियाँ राज्य सरकार से भिन्न है या और केंद्र सरकार ने उसमे अपना विश्वास खो दिया हैराज्यपाल के निष्कासन का कारण नहीं बन सकता|
• केंद्रीय सरकार में परिवर्तन उसके निष्कासन का कारण नहीं बन सकते
• एक राज्यपाल को हटाने के फैसले को कानून के किसी भी अदालत में चुनौती दी जा सकती है।अदालत केंद्र सरकार से वह साक्ष्य प्रस्तुत करने को कह सकती है जिसे द्वारा निर्णय लिया गया बाध्यकारी कारणों को सिद्ध करने के लिए|
मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यकारी होता हैराज्यपाल के अधीनस्थ अधिकारियों के बीच में वह सरकार का एक मुखिया होता है। उसकी स्थित/पद एक राज्य में वही होता है जो देश में प्रधानमंत्री का होता है। हमारे संविधान में एक मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त होने वाली विशेषताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं किया गया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्रीराज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।
मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यकारी होता हैराज्यपाल के अधीनस्थ अधिकारियों के बीच में वह सरकार का एक मुखिया होता है। उसकी स्थित या पद एक राज्य में वहीं होता है जो देश में प्रधानमंत्री का होता है।
नियुक्ति
हमारे संविधान में एक मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त होने वाली विशेषताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं किया गया है।
शक्तियां और कार्य
मुख्यमंत्री की शक्तियों और कार्यों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है:
• मंत्रियों परिषद के गठन का अधिकार -
मंत्रियों की राज्य परिषद के लिए मुख्यमंत्री के पास निम्नलिखित शक्तियां होती हैं-
1. वह (मुख्यमंत्री) एक मंत्री के रूप में किसी भी व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए राज्यपाल को सलाह दे सकता है। केवल मुख्यमंत्री की सलाह के अनुसार ही राज्यपाल मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं।

2. 
वह आवश्यकता के अनुसार कभी भी मंत्रियों और विभागों के बीच आबंटन और फेरबदल कर सकता है।
3. राय/विचारों के अंतर के मामले में वह मंत्री को इस्तीफा देने के लिए कह सकता हैअगर वह (मंत्री) इस्तीफा नहीं देता है तो मुख्यमंत्री उसे बर्खास्त करने के लिए राज्यपाल को सलाह दे सकते हैं।
4. वह सभी मंत्रियों का निर्देशनमार्गदर्शन देने के साथ- साथ सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
5. अपने अनुसार अपने मंत्री परिषद की नियुक्ति के साथ से ही वह उसके इस्तीफा देने या मौत की स्थिति में ही पूरी मंत्रिपरिषद को भंग किया जा सकता है।
राज्यपाल से संबंध -
हमारे संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल से संबंधित कार्य निम्न प्रकार हैं:
1) मुख्यमंत्री राज्यपाल से राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रियों की परिषद के सभी निर्णयों पर संवाद करते हैं।
2) जब कभी भी राज्यपाल प्रशासन के बारे में लिए गये निर्णयों से संबंधित कोई भी जानकारी मांगते हैं तो तब मुख्यमंत्री को उस जानकारी को राज्यापल को प्रदान करना या करवाना होता है।
3) जब एक निर्णय कैबिनेट के विचार के बिना लिया गया है तो तब राज्यपाल मंत्रियों की परिषद के विचार के लिए पूछ सकते हैं।
4) मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में जैसे- अटॉर्नी जनरलराज्य लोक सेवा आयोग (अध्यक्ष और सदस्य)राज्य निर्वाचन आयोग आदि के बारे में राज्यपाल के साथ सलाह मशविरा करते हैं।
सरकार की एक मंत्रिमंडल के रूप में अंतत: मुख्यमंत्री ही मतदाताओं के लिए जिम्मेदार होता है। हालांकि वह राज्य का मुखिया होता है लेकिन उसे राज्यपाल को प्रोत्साहित करने और चेतावनी देने के लिए मदद करने हेतु गवर्नर के साथ " सही परामर्श किया जाने वाले नियम" (सरकारिया आयोग की सिफारिश के अनुसार) का पालन करना पड़ता है।
• राज्य विधायिका से संबंध-
1) उसके द्वारा घोषित की गयी सभी नीतियों को सदन के पटल पर रखना होता है।
2) वह राज्यपाल को विधान सभा भंग करने की सिफारिश करता है।
3) वह समय- समय पर राज्य विधान सभा के सत्र के आयोजन और स्थगन के बारे में राज्यपाल को सलाह देता है।
• अन्य कार्य
1) जमीनी स्तर पर उसके पास नियमित रूप से लोगों के साथ संपर्क में रहने का अधिकार है और लोगों की समस्याओं के बारे में जानकारी लेना है जिससे कि वे मुद्दे विधानसभा के पटल पर रखे जा सके और उनके बारे में नीतियां बन सकें।
2) वह राज्य योजना आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है।
3) वह एक वर्ष की अवधि के लिए रोटेशन (परिक्रमण) संबंधित क्षेत्रीय परिषद का उपाध्यक्ष होता है।
4) आपात स्थिति में वह राजनीतिक स्तर पर प्रमुख रूप से एक संकट प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
भारत में पंचायती राज व्यवस्था
भारत में पंचायती राज व्यवस्था
पंचायत भारतीय समाज की बुनियादी व्यवस्थाओं में से एक रहा है। जैसा कि हम सब जानते हैंमहात्मा गांधी ने भी पंचायतों और ग्राम गणराज्यों की वकालत की थी। स्वतंत्रता के बाद सेसमय– समय पर भारत में पंचायतों के कई प्रावधान किए गए और 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के साथ इसको अंतिम रूप प्राप्त हुआ।
अधिनियम का उद्देश्य पंचायती राज की तीन– स्तरीय व्यवस्था प्रदान करना हैइसमें शामिल हैं
क) ग्राम– स्तरीय पंचायत
ख) प्रखंड (ब्लॉक)– स्तरीय पंचायत
ग) जिला– स्तरीय पंचायत
73वें संशोधन अधिनियम की विशेषताएं
• ग्राम सभा गांव के स्तर पर उन शक्तियों का उपयोग कर सकती है और वैसे काम कर सकती है जैसा कि राज्य विधान मंडल को कानून दिया जा सकता है।
• प्रावधानों के अनुरुप ग्राममध्यवर्ती और जिला स्तरों पर पंचायतों का गठन प्रत्येक राज्य में किया जाएगा।
• एक राज्य में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन बीस लाख से अधिक की आबादी वाले स्थान पर नहीं किया जा सकता।
• पंचायत की सभी सीटों को पंचायत क्षेत्र के निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से भरा जाएगाइसके लिएप्रत्येक पंचायत क्षेत्र को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार विभाजित किया जाएगा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की आबादी और आवंटित सीटों की संख्या के बीच का अनुपातसाध्य होऔर सभी पंचायत क्षेत्र में समान हो।
• राज्य का विधानमंडलकानून द्वारापंचायतों में ग्राम स्तरमध्यवर्ती स्तर या जिन राज्यों में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत नहीं हैं वहांजिला स्तर के पंचायतों मेंपंचायतों के अध्यक्ष का प्रतिनिधित्व कर सकता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण
अनुच्छेद 243 डी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों को आरक्षित किए जाने की सुविधा देता है। प्रत्येक पंचायत मेंसीटों का आरक्षण वहां की आबादी के अनुपात में होगा। अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कुल आरक्षित सीटों के एक– तिहाई से कम नहीं होगी।
महिलाओं के लिए आरक्षण– अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए कुल सीटों में से एक तिहाई से कम सीटें आरक्षित नहीं होनी चाहिए। इसे प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरा जाएगा और महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा।
अध्यक्षों के कार्यलयों में आरक्षण– गांव या किसी भी अन्य स्तर पर पंचायचों में अध्यक्षों के कार्यालयों में अनुसूचित जातियोंअनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण राज्य विधानमंडल मेंकानून के अनुसार ही होगा।
सदस्यों की अयोग्यता 
किसी व्यक्ति को पंचायत की सदस्यता के अयोग्य करार दिया जाएगाअगर उसे संबंधित राज्य का विधानमंडल अयोग्य कर देता है या चुनावी उद्देश्यों के लिए कुछ समय के लिए कानून अयोग्य घोषित कर देता हैऔर अगर उसे इस प्रकार राज्य के विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर अयोग्य घोषित किया गया हो तो।
पंचायत की शक्तियांअधिकार और जिम्मेदारियां
राज्य विधानमंडलों के पास विधायी शक्तियां हैं जिनका उपयोग कर वे पंचायतों को स्व– शासन की संस्थाओं के तौर पर काम करने के लिए सक्षम बनाने हेतु उन्हें शक्तियां और अधिकार प्रदान कर सकते हैं। उन्हें आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं बनाने और उनके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
कर लगाने और वित्तीय संसाधनों का अधिकार
एक राज्यकानून द्वारापंचायत को कर लगाने और उचित करोंशुल्कोंटोलफीस आदि को जमा करने का अधिकार प्रदान कर सकता है। यह राज्य सरकार द्वारा एकत्र किए गए विभिन्न शुल्कोंकरों आदि को पंचायत को आवंटित भी कर सकता है। राज्य की संचित निधि से पंचायतों को अनुदान सहायता दी जा सकती है।
पंचायत वित्त आयोग
संविधान के लागू होने के एक वर्ष के भीतर ही (73वां संशोधन अधिनियम, 1992), पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा और उस पर राज्यपाल को सिफारिशें भेजने के लिएएक वित्त आयोग का गठन किया गया था।
भारत में शहरी स्थानीय निकाय
समकालीन समय मेंजैसे की शहरीकरण हुआ है और वर्तमान मेंइसका तेजी से विकास हो रहा हैशहरी शासन की आवश्यकता अनिवार्य है जो ब्रिटिश काल से धीरे– धीरे विकसित हो रहा है और स्वतंत्रता के बाद इसने आधुनिक आकार ले लिया है। 1992 के 74वें संशोधन अधिनियम के साथशहरी स्थानीय प्रशासन व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान कर दी गई।
74 वें संशोधन अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
1. प्रत्येक राज्य में इनका गठन किया जाना चाहिए– क) नगर पंचायतख) छोटे शहरी क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषदग) बड़े शहरी क्षेत्र के लिए नगरनिगम।
2. नगरपालिका की सभी सीटों को वार्ड के रूप में जाने जाने वाले नगरपालिका प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन में चुने गए व्यक्तियों से भरा जाएगा।
3. राज्य का विधान– मंडलविधि द्वारानगरपालिका प्रशासन में विशेष जानकारी या अनुभव वाले व्यक्तियों कोलोकसभा के सदस्यों और राज्य के विधान सभा के सदस्योंराज्य के  परिषद और विधानपरिषद के सदस्यों को नगरपालिका प्रतिनिधित्व प्रदान करता हैसमितियों के अध्यक्ष
4. वार्ड समिति का गठन
5. प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जातियों औऱ अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित होंगी।
6. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए कुल सीटों की एक– तिहाई से कम सीटें आरक्षित नहीं की जाएंगी।
7. राज्यविधि द्वारानगरपालिकाओं को स्व– शासन वाले संस्थानों के तौर पर काम करने में सक्षम बनने हेतु अनिवार्य शक्तियां और अधिकार दे सकता है।
8. राज्य का विधानमंडलविधि द्वारानगरपालिकाओं को कर लगाने और ऐसे करोंशुल्कोंटोल और फीस को उचित तरीके से एकत्र करने को प्राधिकृत कर सकता है।
9. प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर जिला नियोजन समिति का गठन किया जाएगा ताकि पंचायतों और जिलों की नजरपालिकाओं द्वारा तैयार योजनाओं को लागू किया जा सके और समग्र रूप से जिले के लिए विकास योजना का मसौदा तैयार कर सके।
10. राज्य विधान– मंडलविधि द्वारा महानगर योजना समितियों के गठन के संबंध में प्रावधान कर सकता है।
शहरी स्थानीय निकायों के प्रकार
1. नगर निगम
2. नगरपालिका
3. अधिसूचित क्षेत्र समिति
4. शहर क्षेत्र समिति (टाउन एरिया कमेटी)
5. छावनी बोर्ड
6. टाउशिप
7. पोर्ट ट्रस्ट
8. विशेष प्रयोजन एजेंसी
मंत्रिमंडलीय समितियां
मंत्रिमंडल की स्थायी समितियों जिनका पुनर्गठन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है । इन समितियों मेंमंत्रिमंडल की समिति (एसीसीआवास पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीए)आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए)संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समितिराजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीपीए)और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) इत्यादि आते हैं। इन समितियों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। गृह मंत्री और मंत्री के प्रभारी संबंधित मंत्रालय इस समिति के सदस्य होते हैं।विभिन्न मंत्रिमंडल समितियों की संरचना और कार्य निम्नवत् हैं:
1. मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति
समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। गृह मंत्री और मंत्री के प्रभारी संबंधित मंत्रालय इस समिति के सदस्य होते हैं। समिति के महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं:
(i) कैबिनेट सचिवालयसार्वजनिक उपक्रमोंबैंकों और वित्तीय संस्थानों के संबंध में सभी उच्च स्तर की नियुक्तियों पर निर्णय लेना।
(ii) विभाग या संबंधित मंत्रालय और संघ लोक सेवा आयोग के बीच नियुक्तियों से संबंधित असहमति के सभी मामलों के बारे में फैसला करना।
(iii) केन्द्र सरकार के संयुक्त सचिव या उसके समकक्ष और उनके बराबार भुगतान पाने वाले अधिकारियों के अभ्यावेदनअपील और स्मारकों के बारे में विचार करना।
2. आवास पर मंत्रिमंडलीय समिति
समिति का गठन विभिन्न मंत्रालयों से कैबिनेट मंत्रियों द्वारा मिलकर होता है और उनमें से एक इसका प्रमुख होता है। समिति के महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं:
(i) संसद के सदस्यों को आवंटित सरकारी आवासों के बारे में निर्देशों या नियमों और नियमों और शर्तों को निर्धारित करने के विशेष आवंटन को नियंत्रित करना।
(ii) गैर-पात्र व्यक्तियों और संगठनों की विभिन्न श्रेणियों को सरकारी आवास आवंटित करने के बारे में फैसला करना तथा उनसे लिए जाने वाले किराए की दर का निर्णय लेना।
(iii)  दिल्ली से बाहर कार्यरत मौजूदा केन्द्र सरकार के कार्यालयों के स्थानांतरण और दिल्ली में नए कार्यालयों के स्थान के प्रस्तावों के बारे में विचार करना।
3. आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति
प्रधानमंत्री इस समिति के प्रमुख होते हैं। विभिन्न मंत्रालयों के कैबिनेट मंत्री इसके सदस्य होते हैं। इसके महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं:
(i) आर्थिक क्षेत्र में सरकारी गतिविधियों का निर्देशन और समन्वय करना।
(ii) देश में आर्थिक रुझानों की समीक्षा करना और सुसंगत तथा एकीकृत नीतिगत ढांचा को विकसित करना।
(iii) छोटे और सीमांत किसानों से संबंधित तथा ग्रामीण विकास से संबंधित गतिविधियों की प्रगति की समीक्षा करना।
(iv) संयुक्त क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना के लिए मंत्रालयों के प्रस्तावों को शामिल कर औद्योगिक लाइसेंसिंग मामलों का निपटारा करना।
(v) विनिवेश से संबंधित मुद्दों पर विचार करना।
समिति को आवंटित अन्य कार्य इस प्रकार हैं:
(i) विश्व व्यापार संगठन से संबंधित मुद्दों पर विचार और फैसला करना है।
(ii) भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण से संबंधित मुद्दों पर विचार करना।
(iii) सामान्य कीमतों की निगरानी करनाआवश्यक और कृषि वस्तुओं की उपलब्धता और निर्यात का आकलन करना तथा कुशल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए कदम उठाना।
4. राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति

General knowledge

संविधान की अनुच्छेद  74 (1)  में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसका प...

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